भारत में विभिन्नता के होते हुए भी संस्कृति की एकता पाई जाती है। ध्यान देने की बात है कि भारत में विभिन्नता तो अवश्य पाई जाति है, पर संस्कृति की एकता के विषय में मतभेद है। इसका कारण यह है कि प्राचीन युग में भारतीय संस्कृति अन्य संस्कृतियों को अपने में असानी से अवश्य मिला लेती थी, परन्तु अब उसका यह गुण समाप्त हो गया है। परिणामस्वरूप अब एक राज्य के निवासी दूसरे राज्य के निवासियों की भाषाओं तथा रीती-रिवाजों एवं परम्पराओं को भी सहन नहीं कर रहे हैं। संस्कृति की संकीर्णता के साथ-साथ जब देश में और भी ऐसी विघटनकारी प्रविर्तियाँ विकसित हो गई है जिनके कारण धर्म एकता एक जटिल समस्या बन गई है। इस समस्या को सुलझाने के लिए माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार – हमारी शिक्षा को ऐसी आदतों तथा दृष्टिकोण एवं गुणों का विकास करना चाहिये जो नागरिकों को इस योग्य बना दें कि वे जनतंत्रीय नागरिकता के उत्तरदायित्वों को वहन करके उन विघटनकारी प्रवितियों का विरोध कर सकें जो व्यापक, राष्ट्रीय तथा धर्म-निपेक्ष, दृष्टिकोण के विकास में बाधा डालती है।